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देश

यात्रा अभी अधूरी… रिटायरमेंट से पहले CJI गवई ने आखिर क्यों किया बड़ा आह्वान?

News Desk
Last updated: 2025/11/13 at 5:45 PM
News Desk
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5 Min Read
यात्रा अभी अधूरी… रिटायरमेंट से पहले CJI गवई ने आखिर क्यों किया बड़ा आह्वान?
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नई दिल्ली 
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने आह्वान किया है कि लैंगिक समानता (Gender justice) की दिशा में हमारी यात्रा तभी सफल होगी, जब महिलाएँ और पुरुष दोनों मिलकर सहयोग करेंगे और किसी भी चुनौती को पार पाने में समान रूप से योगदान देंगे। इसके साथ ही CJI गवई ने इस बात पर भी जोर दिया कि लैंगिक न्याय हासिल करना सिर्फ महिलाओं की इकलौती जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पुरुषों को यह स्वीकार करना होगा कि उनके पास मौजूद असमान शक्ति को साझा करना नुकसान की बात नहीं है, बल्कि समग्र रूप से समाज की मुक्ति की दिशा में एक कदम है।
 
CJI ने बुधवार को ये बातें 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान में "सभी के लिए न्याय: लैंगिक समानता और समावेशी भारत का निर्माण" विषय पर देते हुए कहीं। उन्होंने कहा, "लैंगिक न्याय प्राप्त करना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए पुरुषों द्वारा, विशेष रूप से हमारे संस्थानों, कार्यस्थलों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में सत्ता के पदों पर आसीन पुरुषों द्वारा, सत्ता की सक्रिय पुनर्कल्पना की जरूरत है।" उन्होंने कहा, “वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष यह समझेंगे कि सत्ता साझा करना नुकसान नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति का कार्य है। इसलिए, लैंगिक समानता वाले भारत का मार्ग टकराव में नहीं, बल्कि सहयोग में निहित है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ मिलकर हमारे संविधान द्वारा परिकल्पित समानता के नैतिक और संस्थागत ढाँचे का पुनर्निर्माण करते हैं।”

75 वर्षों की प्रगति का भी किया उल्लेख
बार एंड बेंच के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने व्याख्यान में 1950 में भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 25-25 वर्षों के तीन चरणों में इस क्षेत्र में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, "1975 के बाद, लैंगिक समानता पर राष्ट्रीय विमर्श औपचारिक अधिकारों के प्रश्नों से आगे बढ़कर, समानता के एक अभिन्न अंग के रूप में गरिमा के गहन विचार की ओर मुड़ने लगा। बातचीत केवल कानूनी समानता से आगे बढ़कर महिलाओं की स्वायत्तता, शारीरिक अखंडता और उनके जीवन के अनुभवों को आकार देने वाली सामाजिक वास्तविकताओं की मान्यता की ओर मुड़ गई।"

मानव गरिमा की संरक्षक रहीं अदालतें: CJI
उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की दृढ़ता और आम नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाये रखा है। उन्होंने कहा कि मान्यता और समानता के लिए प्रारंभिक संघर्षों से लेकर अंतर्संबंधी और सहभागी न्याय के वर्तमान युग तक, अदालतें अक्सर समानता और मानव गरिमा के संरक्षक के रूप में खड़ी रही हैं।

चुनौतियों से भरा रहा है इतिहास
जस्टिस गवई ने कहा, ‘‘यह विकासक्रम चुनौतियों से रहित नहीं रहा है। ऐसे कई अवसर आए जब न्यायिक व्याख्याएं महिलाओं के वास्तविक जीवन के अनुभवों को सही तरह नहीं समझ सकीं या संविधान की परिवर्तनकारी भावना पर खरी नहीं उतरीं।” उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की निरंतरता और साधारण नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाए रखा है।

यात्रा अभी भी अधूरी
इस कार्यक्रम में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी के उपाध्याय और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एम बी लोकुर भी शामिल हुए। प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा, ‘‘अदालतों और लोगों के बीच संवाद भारत की लोकतांत्रिक ताकत के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है, जो हमें याद दिलाता है कि लैंगिक समानता की ओर बढ़ना कोई मंजिल नहीं है, बल्कि यह एक प्रतिबद्धता है जिसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है।’’ हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रगति के बावजूद, वास्तविक लैंगिक समानता की दिशा में यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। बता दें कि जस्टिस गवई इसी महीने 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

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